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मौन ही मुक्ति है: अद्वैत और जैन मार्गों में आत्मबोध की तुलनात्मक अध्ययन उपशीर्षक: मौन, मुद्रा और ध्यान के माध्यम से ब्रह्मबोध और केवलज्ञान की दृष्टि से अध्ययन

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मौनम् ब्रह्म — दक्षिणामूर्ति के माध्यम से आत्मबोध की यात्रा

लेखक: सौरभ गर्ग
स्वतंत्र शोधकर्ता, पार्थ प्लैनेटरी रिसर्च, दिल्ली
संपर्क सूत्र: +91-9718327277 | moneymaatrix27@gmail.com


सारांश

यह लेख “मौनम् ब्रह्म” — सत्य की मौन अनुभूति — पर आधारित एक तुलनात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। अद्वैत वेदान्त के दक्षिणामूर्ति ध्यानम् और जैन दर्शन के केवलज्ञान परंपरा को केंद्र में रखते हुए, यह अध्ययन मौन (मौना) के प्रतीक, गुरु परंपरा, सत्य की कालातीतता, मुद्राओं का अर्थ और आनंदमयी आत्मबोध की व्याख्या करता है।

यद्यपि अद्वैत (अद्वैतवाद) और जैन (अनेकांतवाद) दार्शनिक रूप से भिन्न हैं, दोनों परंपराएँ इस बात पर एकमत हैं कि — मौन ही सर्वोच्च ज्ञान का माध्यम है, और आत्मबोध ही मोक्ष की चरम अवस्था है।

मुख्य शब्द — अद्वैत वेदान्त, दक्षिणामूर्ति, जैन दर्शन, केवलज्ञान, मौना, आत्मबोध, चिन्मुद्रा, गुरु परंपरा, मौन


🕉 I. मौन व्याख्या — मौन के माध्यम से सत्य का संप्रेषण

🔷 वेदांत दृष्टिकोण

“मौनव्याख्या प्रकटित परब्रह्मतत्त्वं युवानं…”
परब्रह्म की अभिव्यक्ति वाणी से नहीं, बल्कि मौन के माध्यम से होती है — ऐसा मौन जो आत्मसाक्षात्कार से युक्त हो।

तैत्तिरीय उपनिषद् 2.9:
“यतो वाचो निवर्तन्ते, अप्राप्य मनसा सह”
जहाँ वाणी और मन भी नहीं पहुँच सकते, वही ब्रह्म है।

🔶 जैन दृष्टिकोण

“ण संथाणं ण विहिणं ण पंथा ण वज्जइ सुद्धे धम्मे”
— आचारांग सूत्र 1.1.2.4
शुद्ध धर्म में न कोई गमन है, न कोई मार्ग — केवल मौन और समत्व है।

“मुणिए भगवं अण्णाणणिव्वाणि”
— समयसार गाथा 1
मुनि वह है जो अज्ञान का नाश कर मौन में स्थित रहता है।

जैन मौन व्रत एक प्रधान तप है, जो अनुभव के द्वारा आत्मबोध की ओर ले जाता है — ठीक वैसे ही जैसे शंकराचार्य के दक्षिणामूर्ति में वर्णित है।


📚 II. गुरु परंपरा – मौन में स्थित गुरु और श्रद्धालु ऋषि

🔷 वेदांत दृष्टिकोण

“वर्षिष्ठान्ते वसदृषिगणैः आवृतं ब्रह्मनिष्ठैः…”
ब्रह्मनिष्ठ ऋषि, गुरु के चारों ओर मौन श्रद्धा में स्थित हैं — ज्ञान स्वयं आत्मसाक्षात्कार के सम्मुख नतमस्तक हो जाता है।

🔶 जैन दृष्टिकोण

तीर्थंकर या केवली मौन में स्थित होते हैं। उनके गणधर (प्रमुख शिष्य) और श्रुत-केवली (शास्त्रज्ञानी) उनके केवलज्ञान की व्याख्या करते हैं।

“णाणं ववसाइं तस्स जाणं जाणं जहा भणं”
— सूत्रकृतांग सूत्र 1.6.25
सच्चा ज्ञान आंतरिक अनुशासन से प्राप्त होता है, बाह्य वाणी से नहीं।

भगवान महावीर का ध्यानमग्न चित्र — साल वृक्ष के नीचे, मुनियों से घिरे हुए — दक्षिणामूर्ति की छवि की तरह प्रतीत होता है।


🌱 III. युवानं – सत्य की चिर-नवीनता

🔷 वेदांत दृष्टिकोण

“युवानं” — ब्रह्म की चिरनवीनता!
गुरु का युवा रूप इस बात का संकेत है कि ब्रह्म कभी वृद्ध नहीं होता, वह शाश्वत नवीन चेतना है।

🔶 जैन दृष्टिकोण

“अहं निअणुओ सुद्धो, मणो-वाय-काएहिं दुक्खं न मं…”
— आत्मसिद्धि शास्त्र (श्रिमद राजचंद्र)
मैं अजर-अमर हूँ, शरीर, वाणी और मन से रहित।

“परिणामेण युवा जीवो, कालो न तं जरां नेतुं शक्नोति।”
— नियमसार, गाथा 57
आत्मा सदा युवा है, समय उसे वृद्ध नहीं कर सकता।


🖐 IV. चिन्मुद्रा – ज्ञान और मुक्ति का प्रतीक

🔷 वेदांत दृष्टिकोण

“करकलितचिन्मुद्रमानन्दरूपं”
चिन्मुद्रा में जीव और परमात्मा की एकता को दर्शाया गया है — अज्ञान, वासना और कर्मों से मुक्ति के बाद।

🔶 जैन दृष्टिकोण

“णाणं चरित्तं तवो च कवलं, एयं मोक्खस्स मग्गं पवण्णं”
— तत्त्वार्थ सूत्र 1.1
सम्यक ज्ञान, आचरण और तप ही मोक्ष का मार्ग हैं — जो मौन और समाधि में प्रतिष्ठित है।

जैन परंपरा अधिक नैतिक और व्यवहारिक है, पर उसका मुद्रा तत्त्व अद्वैत के अद्वय बोध से साम्य रखता है।


💫 V. आत्मबोध – आत्मानंद की स्थिति

🔷 वेदांत दृष्टिकोण

“स्वात्मारामं मुदितवदनं”
जो आत्मा में रमण करता है, वह सदा प्रसन्न और मुक्त रहता है।

“आनन्दरूपं” — “रसवैतत्”
— तैत्तिरीय उपनिषद्
आत्मा ही परमानंद का स्वरूप है।

🔶 जैन दृष्टिकोण

“संपिक्खे अप्पगंत्तं, अहिंसासमयं सयंभावं…”
— आचारांग सूत्र 1.2.1
आत्मा का निरीक्षण करो — वही अहिंसा, स्वभाव और आनंद है।

“णण्णं चक्कु, अप्पा अओ, णिव्वाणं सुक्खं…”
— उत्तराध्ययन 28.27
ज्ञान नेत्र है, आत्मा शाश्वत है, और निर्वाण ही परम सुख है।

सिद्धशिला परमानंद — जैन मोक्ष भी वेदान्त के आनंदमय आत्मा के समान ही है।


📜 VI. निष्कर्ष — मौन ही अंतिम उपदेश है

  • वाणी से परे है सत्य
  • गुरु/केवली मौन में ही बोध कराते हैं
  • आत्मबोध = शाश्वत आनंद
  • मोक्ष = कर्मबंधन से मुक्ति + आत्मजागरण

🔅 संस्कृत समापन श्लोक — तुलनात्मक भाव

वेदांत:
“ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।”
— विवेकचूडामणि 20
ब्रह्म ही सत्य है, जगत मिथ्या है, जीव ब्रह्मस्वरूप है।

जैन:
“अप्पाणं ववहारेण, जो जाणइ तणु तत्तओ,
सो णाणं चरित्तं च, जणइ णिव्वाणस्स कारणं।”

— समयसार गाथा 253
जो अपने आत्मा को व्यवहार में जानता है, वह ज्ञान और आचरण से मोक्ष को प्राप्त करता है।


🪔 उपसंहार

आदि शंकराचार्य के दक्षिणामूर्ति ध्यान और जैन केवलज्ञान परंपरा — यद्यपि अद्वैत और अनेकांत दर्शन में भिन्न — इस बात पर सहमत हैं कि:

  • सत्य वाणी से परे है
  • गुरु मौन में प्रकाश देता है
  • मोक्ष: आनंदमय, कालातीत, आत्मस्थिति है

📚 संदर्भ ग्रंथ

  1. तैत्तिरीय उपनिषद् (शंकर भाष्य सहित), अद्वैत आश्रम संस्करण
  2. विवेकचूडामणि, आदि शंकराचार्य, मोतीलाल बनारसीदास
  3. आचारांग सूत्र, सूत्रकृतांग सूत्र, आगमोंदय समिति
  4. समयसार — आ. कुंदकुंद, अनुवाद: ए. चक्रवर्ती, भारतीय ज्ञानपीठ
  5. नियमसार — आ. कुंदकुंद, टीका: अमृतचंद्राचार्य
  6. उत्तराध्ययन सूत्र — आगमोंदय समिति
  7. आत्मसिद्धि शास्त्र — श्रीमद राजचंद्र, श्रीमद राजचंद्र आश्रम

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